Sunday, 23 October 2011
Saturday, 22 October 2011
रात भर फिर जगा रही है मुझे।
रात भर फिर जगा रही है मुझे।
याद उसकी सता रही है मुझे ॥
दिल के दरवाज़े पे देकर दस्तक,
कोई लड़की बुला रही है मुझे॥
ये ज़रूरत भी क्या अजब शै है,
गलियों गलियों फिरा रही है मुझे।
तुमसे थोड़ा सा अलग होते ही,
दुनिया आंखे दिखा रही है मुझे॥
कुछ सियासी जमात ने खाया,
कुछ ये महगाई खा रही है मुझे।
ज़िंदगी देखो आजकल "सूफ़ी",
मय के प्याले पिला रही है मुझे।
राकेश”सूफ़ी”
याद उसकी सता रही है मुझे ॥
दिल के दरवाज़े पे देकर दस्तक,
कोई लड़की बुला रही है मुझे॥
ये ज़रूरत भी क्या अजब शै है,
गलियों गलियों फिरा रही है मुझे।
तुमसे थोड़ा सा अलग होते ही,
दुनिया आंखे दिखा रही है मुझे॥
कुछ सियासी जमात ने खाया,
कुछ ये महगाई खा रही है मुझे।
ज़िंदगी देखो आजकल "सूफ़ी",
मय के प्याले पिला रही है मुझे।
राकेश”सूफ़ी”
उसके ग़म मे पलकें भिगोना ठीक नहीं।
उसके ग़म मे पलकें भिगोना ठीक नहीं।
हरजाई के प्यार मे रोना ठीक नहीं॥
अश्कों से क्यूँ गाल भिगोते रहते हो,
फूलों को तेज़ाब से धोना ठीक नहीं॥
दुश्मन चाहे जितना ही ज़ालिम हो मगर,
कोई मुनाफ़िक़ दोस्त का होना ठीक नहीं॥
उनपे जवानी आई उन्हे मालूम नहीं,
ऐसी उम्र मे खेल खिलौना ठीक नहीं॥
फूलों की बरसात जो हमपे करता है,
उसकी राह मे कांटे बोना ठीक नहीं॥
राकेश “सूफी”
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